सोमवार, फ़रवरी 12, 2018

दिल्ली..!!

तुम दिल्ली थी
तुम्हें हर कोई पाना चाहता था

मैं भी दिल्ली था
मुझे हर कोई लूट लेना चाहता था

हम दोनों का दिल भी दिल्ली था
सौ बार उजड़ने के बाद भी
बस ही जाता था

समय भी दिल्ली था
वो मुझे, तुम्हें, हमारे दिल को
'कुछ नहीं' समझता था

लोग भी दिल्ली थे
'सब कुछ' समझते थे
कभी चुप रहते थे
कभी हँसते थे

वो बात भी दिल्ली थी
जो हमारी कहन की पहुँच से
हमेशा दूर ही रही

एक बात बताओ न
सब दिल्ली-दिल्ली क्यों है यहाँ ?

अनुराग अनंत

तेरा चेहरा वो खंज़र है हुस्ना..!!

हुस्ना तेरे साथ बिताया हर लम्हा
रह रह कर कविता बनकर रिसता है
भीतर है कोई जो तेरी याद में रोता है
बाहर है कोई जो हर एक बात पर हंसता है
तेरा चेहरा वो खंज़र है हुस्ना 
जिसका क्या कहना
वो हर धड़कन के साथ
थोड़ा और ज़िगर में धंसता है
हुस्ना तेरे साथ बिताया हर लम्हा
रह रह कर कविता बनकर रिसता है...
अनुराग अनंत

शनिवार, फ़रवरी 10, 2018

रोजगार पे चोट पकौड़ा...!!

इधर पकौड़ा, किधर पकौड़ा
देखव जिधर , उधर पकौड़ा
अजर पकौड़ा, अमर पकौड़ा
भइया सबसे जबर पकौड़ा
मर गये जेका खाय के बापू
अइसा तगड़ा ज़हर पकौड़ा
नदी पकौड़ा, नहर पकौड़ा
सुबह, शाम, दोपहर पकौड़ा
हँस कर सब पर ढाय दिहिन
मोदी जी फिर कहर पकौड़ा
सड़क पकौड़ा, डगर पकौड़ा
गली,मोहल्ला, शहर पकौड़ा
जेपर चढ़ कर जीत गयेन
ऊ मोदी जी के लहर पकौड़ा
गाल पकौड़ा, बाल पकौड़ा
माशूका के नज़र पकौड़ा
कटी जेब का हाल पकौड़ा
बेकारी का असर पकौड़ा
आटा, चावल, दाल पकौड़ा
फटा हाल कंगाल पकौड़ा
यूपी, एमपी, बंगाल पकौड़ा
न पूछो अब हाल पकौड़ा
चीन और जापान पकौड़ा
सारा पाकिस्तान पकौड़ा
दुश्मन की गर्दन काट पकौड़ा
चाट रे भेजा चाट पकौड़ा
काला धन का नाश पकौड़ा
योगी का संन्यास पकौड़ा
आडवाणी की आस पकौड़ा
जेटली की प्यास पकौड़ा
नोटबंदी का काम पकौड़ा
जीएसटी अंजाम पकौड़ा
बीजेपी के राम पकौड़ा
संघ का चारो धाम पकौड़ा
कान खोल के सुन बे पकौड़ा
दुइनो हाँथ से थाम पकौड़ा
रोजगार पे चोट पकौड़ा
कमल पे पड़गा वोट पकौड़ा
अब लड़ाओ जाम पे जाम पकौड़ा
न्यू इंडिया के फुलफॉर्म पकौड़ा
भुगतव अब अंजाम पकौड़ा
याद करव अब राम पकौड़ा
बनगा हिंदुस्तान पकौड़ा
कर लेव थोड़ा शान पकौड़ा
लय लिहिस साला जान पकौड़ा
मोदी के बेईमान पकौड़ा

अनुराग अनंत

बोलय में ऊ तेज हैं भइया..!!

बोलय में ऊ तेज हैं भइया
बहुत बड़े रंगरेज़ हैं भइया
लंद-फंद के गज़ब मास्टर
बिल्कुलय अंग्रेज है भइया

कीचड़ कमल तालाब हैं भाइया
शेरवानी टंका गुलाब हैं भाइया
चेहरे से महताब हैं भाइया
नेचर से आफ़ताब हैं भइया
जुमले वाली किताब हैं भइया
हीरो में अमिताभ हैं भइया
ख़ुद में एक ख़िताब हैं भइया
खौलत भै तेज़ाब हैं भइया
कन्ना कमानी पतंग हैं भइया
मंझा चौचक चंगेज़ हैं भाइया
बोलय में ऊ तेज हैं भइया
बहुत बड़े रंगरेज़ हैं भइया....

उनके जलवा हाई है भइया
सबसे बड़े हलवाई हैं भइया
सूट बूट अउ टाई हैं भइया
इंटरनेट, वाई फाई हैं भइया
कुर्ते पे चिकन कढ़ाई हैं भइया
जयपुर की गरम रजाई हैं भइया
मशरूम के चिकनाई हैं भइया
दूध दही अउ मलाई हैं भइया
इत्र के तगड़ी महक हैं भइया
फूल सुनहरी सेज़ हैं भाइय
बोलय में ऊ तेज हैं भइया
बहुत बड़े रंगरेज़ हैं भइया.....

पकौड़ा भी रोज़गार है भइया
भीतर का उद्गार है भइया
युवा बेरोज़गार है भइया
ऊपर से ओका प्यार है भइया
बिल्कुल बंटाधार है भइया
पर सब फिर तैयार हैं भइया
तगड़ी फैली रार है भइया
पक्ष विपक्ष तकरार है भइया
चाकू छूरी तलवार है भइया
सब के तेज़ औज़ार है भइया
जनता के सर चढ़ कर बैठौ
टेबल कुर्सी मेज़ हैं भइया
बोलय में ऊ तेज हैं भइया
बहुत बड़े रंगरेज़ हैं भइया......!!

अनुराग अनंत

गुरुवार, दिसंबर 28, 2017

दिल की बात !!

मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि
मैं आजतक वो नहीं कह सका
जो मुझे कहना था

मैं अकेला नहीं हूँ
तुम भी हो मेरे साथ
जो नहीं कह पाया है दिल की बात

फ़र्क बस इतना है कि
मैं ये बात कह पा रहा हूँ
और तुम हो कि
इतना भी नहीं कह पाते

मुझे मेरी ख़ामोशी में चुभन महसूस होती है
इसलिए मैं कविता बनाता हूँ

तुम्हें तुम्हारी ख़ामोशी महसूस ही नहीं होती
इसलिए तुम बेवकूफ बनाते हो
खुद को भी
और दुनिया को भी

अनुराग अनंत

सोमवार, दिसंबर 25, 2017

प्यार...!!

प्यार से
सबसे पहले आधा 'प' अलग हुआ
और बचा सिर्फ 'यार'
जिसमे बाद में
'र' रुपये में बदल गया
और 'या' से याद ही बची सीने में

और तुम हो कि पूछते हो
मजा आ रहा है जीने में ?

अनुराग अनंत

मैं एक रहस्य ही हूँ..!!

मैं खुद को एक नदी समझता था
और वो मुझे एक तालाब समझती थी
मुझे लगता था
मैं नदी की तरह आगे निकल जाऊंगा
और उसे लगता था कि
मैं तालाब की तरह वहीँ रह जाऊंगा

वो ना तालाब थी, ना नदी
वो पानी थी
और उसके जाने के बाद
मैं ना तालाब रहा, ना नदी

मैं क्या हूँ ?
अब ये एक रहस्य है

और शायद
मैं एक रहस्य ही हूँ !!

अनुराग अनंत

बुधवार, दिसंबर 20, 2017

एक अधूरी सी कहानी..!!

एक अधूरी रात
अधूरा इश्क़
अधूरी ज़िंदगी

एक अधूरी मुलाकात
अधूरा ख़ुदा
अधूरी बंदगी

एक अधूरी वाह
अधूरी आह
अधूरी चाह है

एक अधूरी नदी
अधूरा समंदर
अधूरी थाह है

एक अधूरा सा कदम है
एक अधूरा सा सनम है
एक अधूरे से हम हैं

एक अधूरा सा ख़्वाब है
एक अधूरा सा जवाब है
एक अधूरा इन्तेख़ाब है

एक अधूरा सा अधूरापन अधूरा रह गया है
कोई अधूरी बात में अधूरी बात अपनी कह गया है
ये अधूरा खंडहर, अधूरा खड़ा, अधूरा ढह गया है
ये अधूरा सा अश्क़, अधूरा है, अधूरा बह गया है

यह अधूरापन पूरा कर रहा है जिंदगानी
क्या है मेरा तआरुफ़ जो पूछो ,तो बताऊं !
एक अधूरी सी व्यथा है, एक अधूरी सी कहानी ।।

अनुराग अनंत

नैना तेरे दरस बिना...!!

बांझ हुए नैना तेरे दरस बिना
इन नैनन का यारा अब क्या करना

इन नैनन से देखा तुझको
अब कुछ देखन को न जिया करे
तुझको देख के जीते मरते थे
अब कैसे जिएं और कैसे मरें
नयनों से अश्क़ झरे ऐसे
जैसे झरता हो कोई झरना

बांझ हुए नैना तेरे दरस बिना....

नयना के सब रंग उतर गए
सपने सब के सब बिखर गए
तुम रंग थे मेरे इन नयनों के
तुम बिन बेरंग हुए नयना
मेरे नयना सजना भूल गए
जब से बिछड़े तुम सजना

बांझ हुए नैना तेरे दरस बिना.....

न देखूँ जग न याद जगे
न तुझको देखन की लाग लगे
जो तू ही मुझसे बिछड़ गया
तो क्यों न बिछड़ें ये नयना
जो तू ही जीवन मे रहा नहीं
तो फिर इन नयनों का क्या रहना

बांझ हुए नैना तेरे दरस बिना
इन नैनन का यारा अब क्या करना....

अनुराग अनंत

गुरुवार, दिसंबर 07, 2017

या रब अब दंगा न दीजो !!

हमसे उन्होंने कहा
कि हमें मंदिर बनाना है
हमें मस्जिद बनाना है
उन्होंने हमें बताया
कि हमारे राम को खतरा है
हमारे रहीम पर मुसीबत है
उन्होंने हमें दलीलें दीं
कि हमारे धर्म को मिटाने की साजिश हो रही है
हमारे दीन को कोई खतम करना चाहता है
उन्होंने हमसे कहा
कि हमें ये सब बचाने के लिए आपस में लड़ना पड़ेगा
और हम उनकी बात मन कर लड़ने लगे
लड़ाई हुई, दंगे हुए
लड़ाई-दंगों में
मंदिरें टूटीं
मस्जेदें टूटीं
राम मरा
रहीम क़त्ल हुआ
हमारा धर्म और दीन छाती पीट-पीट कर हमारी लाशों पर रोते रहे

और जिन्होंने हमें लड़ने के लिए कहा था
वो हमारे घरों में हमारी बहन-बेटियों की इज्जत से खेलते रहे
हमारे घर लूटते रहे
चुनाव जीत कर सरकार बनाते रहे
टीवी पर आते-जाते रहे
अखबारों पर मुस्कुराते रहे
बड़ी-बड़ी इमारतों पर झंडा फहराते रहे
राष्ट्रगान गाते रहे
यज्ञ-हवन और अभिषेक करते रहे
अजान-नमाज़ और रोज़े अता करते रहे

और हम जो जिन्दा आदमी थे कभी
महज़ गीनती और तारीख भर हो कर रह गए

अनुराग अनंत

हम भारत के भूखे लोग..!!

पेट जब पीठ पर टिक जाता है
तो कोई तर्क नहीं टिकता है
चाँद, चाँद नहीं रहता
चाँद रोटी हो जाता है।

आदमी जितना निरीह होता जाता है
उतना ख़तरनाक़ और खूंखार हो जाता है
भूखा आदमी सवाल हो जाता है,
बवाल हो जाता है
दीवार हो जाता है

वो चौराहे के बीचोबीच खड़ा हो कर
दर्ज़ करता है, अपना हस्तक्षेप !!
और प्रस्तावना में 'हम भारत के लोग...'
की जगह लिख देना चाहता है
हम 'भारत के भूखे लोग....'

पर ठीक उसी समय याद आता है
भूख से पहले उसके पास जाति है
धर्म है, क्षेत्र है, भाषा है, और गर्व है

जिस दिन वो भूख के अलावा सबकुछ भूल जाएगा
उसदिन बादशाह को छट्ठी का दूध याद आ जाएगा।

अनुराग अनंत

आदमी आदी हो गया है..!!

आदमी आदी हो गया है
आदमियों की नकल का

वो फ़ायदा उठता है
आदमियों जैसे हाँथ-पैर
पेट,पीठ और शकल का

आप किसी आदमी जैसे को
आदमी समझ लेते हैं
इस तरह एक भरम है
जो आदमियत की परिभाषा हो गया है

आदमी गोल-मटोल तर्क हो गया है
एक चुकी हुई भोथरी भाषा हो गया है

ये आदमी अकेले में आईने से डरता है
और जिस दिन सच्चाई से आईना देख लेता है
बस उसी दिन मरता है

आदमी, आदमी जैसे काम बहुत कम करता है
जब सर तान कर चलने की जरूरत होती है
वो रपट कर गिरता है
आदमी मरते हुए जीता है
और जीते हुए मरता है
आदमी, आदमी जैसे काम बहुत कम करता है।

अनुराग अनंत

और बड़ा सपना..!!

एक दिन मेरा मन किया, मैं कुछ बहुत अच्छा लिखूँ।

मैंने तुम्हारा नाम लिखा।

और फिर दुनिया की सारी कविताओं ने दाद दी
सारे कवि अचंभे से निहारते रहे मुझे
मेरे आस-पास मोर के पंख की तरह बिखर गए संसार के सारे महाकाव्य

इस तरह मैं, मैं नहीं रहा
मुझे एक झटके से पता चला
सपना जब कागज पर उतरता है
तो और बड़ा सपना हो जाता है

अनुराग अनंत

'मैं' से 'तुम' तक की सुरंग !!

सुरंगों के इस देश में
जहाँ हर शहर, कस्बे और मुहल्ले में
किसी न किसी सुरंग का किस्सा आम है

मैं भी एक सुरंग ढूंढ रहा हूँ
जो मुझसे हो कर तुम तक पहुंचती हो

कोई मुझमें प्रवेश करे तो तुममें निकले
कोई तुममे डूबे तो मुझमे उतराए

मैं आजकल बस दिन रात वही सुरंग ढूढ़ रहा हूँ
और लोग हैं कि कहते हैं
मैं कवि होता जा रहा हूँ
शायर सा दिखने लगा हूँ
मैं बदलता जा रहा हूँ

मुझे भी लगता है
गर नहीं ढूढ़ पाया ऐसी सुरंग
तो इस तरह बदल जाऊंगा
कि सुरंग हो जाऊंगा

'मैं' से 'तुम' तक की सुरंग !

अनुराग अनंत

संभावनाएं !!

संभावनाएं संभव है सारी संभावना खो दें
और भावनाएं अनाथ भवनों के अहाते में लावारिश पशुओं सी बेड़ दीं जाएं

आँसूओं में बहें आशाएं
और आशंकाओं पर जा कर टिक जाएं आस्थाएं

वो आएं तो शायद इस तरह आएं
कि बदल जाएं सब की सब परिभाषाएं
अपनी पीठ खुजलाने को रीरियाए व्याकरण
और किसी दरबारी कवि सी हो जाएं भाषाएं

जो तुम देखो तो हर आदमी में तुम्हें सधा हुआ आदमी दिखे
हर आदमी में बंधा हुआ आदमी दिखे

मन में पालती मारकर बैठ जाए पागलपन
और जो तुम उसको एक छंटाक परसो
तो ज़िद करके तुमसे मांगे
खाने को एक मन

रात के अंधेरे में गूंजता रहे
'भात-भात' का संगीत
और दूर कहीं कोई माँ
अपने बच्चे की लाश पर
लालसाओं का लेप लगा कर
सुरक्षित कर ले
भीतर बहुत भीतर किसी तहखाने में

संभावना ये भी है कि जब तुम्हें चीख़ कर रोना हो
अपने डर को खोना हो
तुम्हें मिल जाए कोई क़िताब
तुम उसकी प्रस्तावना पढ़ो
और घटित होने पर आमादा किसी घटना की तरह
घटित होने से पहले ही स्थगित हो जाओ
अनुराग अनंत

गुरुवार, जुलाई 20, 2017

प्रेम और परिवर्तन..!!

जब आवाज़ों में घुला हुआ सन्नाटा
और सन्नाटों में लिपटी हुई आवाज़
सुनाई देने लगे तुम्हे

और तुम रातों के दोनों सिरों के बीच
उलझन के पुल पर
सवालों की छड़ी टेकते हुए चलो
तो समझना कि कोई उतरा है
तुम्हारे दिल के सरोवर में इस तरह
कि पूरा पानी गुलाबी हो गया है

या टूटा है भीतर कुछ इस तरह
कि छप्पर से टपकने लगी हैं
बरसात की बूँदें
और सुकून के बिस्तर पर लेटा यक़ीन
भीग कर एकदम खारा हो गया है

तुम ऐसे में तलाशोगे जब खुद को कभी
तब शब्दों के मर चुके अर्थों के बगल बैठा हुआ पाओगे

आंसू तुम्हें उस समय
तुम्हारी आत्मा की नदी से बहती हुई
एक धारा लगेंगे

और ख़ामोशी उस नदी में तिरती हुई नाव

निर्वात से संघात के इस समय
जब सबकुछ बदल रहा होगा
तुम महसूसना कहीं किसी कोने में बैठकर
तुम्हारा "मैं" तुम्हे गढ़ रहा होगा

कोई तुम्हारे भीतर इसतरह बढ़ रहा होगा
जैसे बढ़ती है बरसात में नदी

सबकुछ डूबा देने के लिए
पुराने को मिटा देने के लिए
नए को जगह देने के लिए

प्रेम और परिवर्तन
दोनों उलझन के पाँव से चल कर आते हैं
और हमारे भीतर, बहुत भीतर
इस तरह गहराते हैं

कि हम प्रेमी बन जाते हैं
परिवर्तित हो जाते हैं

तुम्हारा-अनंत     

अभिशप्त नट..!!

चादर पर पड़ी सिलवट
मेरी परेशानियों की केचुल है
और बिस्तर पर जागती करवट
उस किताब के पन्ने पलटने की क्रिया
जिसमे दर्ज हुआ है, मेरा अतीत
और लिखा जाना है मेरा भविष्य

मैं उन जगती हुई आँखों की तरह हूँ
जिसमे भरीं हैं स्मृतियों की किरचें
और खाली कर दी गयी है नींद

जागना, जेठ की दोपहरी में
तपती सड़क पर नंगे पाँव चलना है
और ठहरना अपनी नसें काट कर मुस्कुराने जैसा कुछ

खाली बटुए का सन्नाटा
कोई मायूस फिल्म है
जिसे देख कर मन अजीब सा उदास हो जाता है
और सपना वो जरुरत जो जीने के लिए जरूरी है

यथार्थ भ्रम का प्रतिबिम्ब है
और भ्रम तो भ्रम है ही

सैकड़ों जागती रातों ने मुझे ये सत्य बताया है
कि जन्म और मृत्यु कुछ नहीं हैं
सिवाए दो बिंदुओं के
जिनके बीच तान कर बाँध दिया गया है जीवन

जिस पर अभिशप्त नट की तरह चलते हैं हम
शरू से लेकर अंत तक

तुम्हारा-अनंत

 

सोमवार, जुलाई 17, 2017

खाली सफ़े की कविता

जो लिखा है
सब अधूरा है, लाचार है
इसलिए कभी कभी सोचता हूँ
लिखना बेकार है

किसी दिन छोड़ दूंगा खाली सफ़ा
जो मन में आए पढ़ लेना उसपे
तुम्हारे और मेरे अनकहे, अनसुने की
इससे बेहतर दूसरी कोई कविता
हो ही नहीं सकती

खाली सफ़े भी कविता होते हैं
पर हम उन्हें पढ़ नहीं पाते
जैसे हम अक्सर पढ़ नहीं पाते
किसी का मन और मौन

तुम्हारा- अनंत



गुरुवार, जुलाई 13, 2017

आदिकवि

वो आदिकवि
अभिवक्ति के मामले में सबसे असफल व्यक्ति रहा होगा
जो अपने भीतर अटकी बात को
लाखों बार, हज़ारों तरीके से कहने के बाद भी नहीं कह सका
रचनाओं पे रचनाएँ, रचता रहा
पर वो नहीं रच सका, जो उसके भीतर
फकीरों की तरह भटकता था
अधमरे आदमी की तरह कराहता था
पागलों की तरह चीखता था
और स्त्रियों की तरह रोता था
वो कभी कभी
बच्चों की तरह मुस्काता भी था
पर ऐसा कम ही होता था

आदिकवि नहीं रच सका
वो जो रचना चाहता था
नहीं कह सका वो जो कहना चाहता था
वो हर युग में जन्म लेता रहा
और अपने असमर्थता को पूरे सामर्थ से जीता रहा
अपने भीतर अटकी हुई बात को
हज़ार तरीके से कहता रहा
और कोई पुराना मकान जैसे आधी रात को बरसात में ढहता है
ठीक वैसे ढहता रहा

दुनिया वालों !
तुम उसकी बिखरन, टूटन उठाते रहे
कविता की तरह गाते रहे
कवि को  ब्रह्म बताते रहे
बिना ये जाने कि कवि सबसे मजबूर और असहाय व्यक्ति होता है
बिलकुल दंगों में बीच सड़क पर खड़े अनाथ बच्चे की तरह

वो जो नहीं लिख सका है कवि
वही लिखा जाना है
आज नहीं तो कल
तब तक जारी रहेगी असमर्थता के उस पार निकल जाने की जिद्द

तुम्हारा-अनंत

मंगलवार, जुलाई 04, 2017

आशा के गीत लिखूंगा मैं....!!

इस पतझड़ में, घोर निराशा में
आशा के गीत लिखूंगा मैं
जब क्षण-क्षण में छाई पराजय है
तब कण कण में जीत लिखूंगा मैं

जब मित्रों में शत्रु उग आए हों
तब शत्रु से प्रीत लिखूंगा मैं
जब अपनों में परायापन जागा हो
तब परायों को मीत लिखूंगा मैं
इस पतझड़ में, घोर निराशा में
आशा के गीत लिखूंगा मैं............!!

मैं घोर तिमिर की गोदी में
दीपक लिख कर आऊंगा
मैं संघर्षों की वेदी पर
बलिदानों का रूपक लिख कर आऊंगा

मैं विकट विवशता के पल में
धरणी का धैर्य लिखूंगा अब
मैं कायरता के कलि कपाट पर
शोणित का शौर्य लिखूंगा अब

राहों के रोड़ों से कह दो
राही गिरना भूल गया है
अब उस सपने को भी चलना होगा
जोकि चलना भूल गया था

मृत्यु के मौसम में झरते, अश्रु के होठों पर
मलमल की मुस्कान लिखूंगा मैं
मन की मरुभूमि में मरते अरमानों के
माथों पर जान लिखूंगा मैं

उलझन में उलझे विस्तृत वितान के मगन मौन पर
जीवन की लय में बहता हँसता संगीत लिखूंगा मैं
इस पतझड़ में, घोर निराशा में
आशा के गीत लिखूंगा मैं...........!!

वज्रों की वर्षा में भी अब
मैं पुष्पों सा खड़ा रहूँगा
दारुण दुःख के दरिया में
चिर चट्टानों सा अड़ा रहूँगा

है विधि वारिध में जितनी लहरे
मैं सब के सब से टकराऊँगा
हिय में शूल धसें हो फिर भी
मैं मुस्काऊँगा, गाऊंगा, लहराऊंगा

जीवन राग में रंगी हुई
रक्तिम रीत लिखूंगा मैं
इस पतझड़ में, घोर निराशा में
आशा के गीत लिखूंगा मैं...........!!

तुम्हारा-अनंत

सोमवार, जुलाई 03, 2017

तेरी याद आती है.....!!

एक टुकड़ा याद अटकी है साँसों में
मैं जी रहा हूँ तो वो भी जी रही है
जब-जब ये सांस आती है
तब-तब तेरी याद आती है
तेरी याद तड़पाती है
तरसाती है, जलाती है
तेरी याद आती है.....!!

तेरे क़दमों का हर एक निशाँ
मक्का मदीना है मेरा
तेरी याद एक समंदर है
जिसमे खोया सफ़ीना है मेरा
तेरे नाम की पाकीज़ा लहरें
मुझको मुझ तक पहुंचती है
तेरी याद आती है.....!!

तेरी यादों के बिन जीना
यारा जो मुमकिन होता
मैं एक लम्हा भी ना जीता
तेरी यादों में ही मर जाता
तेरी यादें वो पोशीदा* धुन हैं
जिन पर मेरी धड़कन गाती है
तेरी याद आती है.....!!

 
तेरी यादें ही वो रास्ता है
जिस पर दिल ये चलता है
जो इसको थोड़ा छेड़ दूँ मैं
ये बच्चों जैसा मचलता है
जब दिल उलझ सा जाता है
तेरी याद उलझन को सुलझती है
तेरी याद आती है.....!!

तुम्हारा-अनंत

*अज्ञात, गुप्त, अप्रकट, छिपा 

इश्क़ का कारोबार..!!

तेरी झूठी झूठी आँखों से
मुझे सच्चा सच्चा प्यार हुआ
मैंने लाख समझाया था दिल को
पर सब समझाना बेकार हुआ
आँखों ने किया आँखों का सौदा
और इश्क़ का कारोबार हुआ
कल से लेकर आज तलक
ऐसा ही हर बार हुआ
इश्क़ का कारोबार हुआ
ऐसा इश्क़ का कारोबार हुआ-2

तेरी थिरकन पे थिरके थे कदम
फिर कहाँ बचे थे हम में हम
रोम रोम सब गिरह खुली
साँस-साँस बरसा सावन
बेफ़िकरी का आलम भी कटा
और मुझमे मैं बेदार हुआ
इश्क़ का कारोबार हुआ
ऐसा इश्क़ का कारोबार हुआ-2

इस दुनिया में ही था मैं
पर इस दुनिया का रहा नहीं
तू मुझसे वो सबकुछ बोला
जो अबतक किसी ने कहा नहीं
जो कुछ अनगढ़ था भीतर-भीतर
वो सबकुछ बन कर तैयार हुआ
इश्क़ का कारोबार हुआ
ऐसा इश्क़ का कारोबार हुआ-2

तेरा झूठा-झूठा सच जो है
सच में सच से भी सच्चा है
इससे अच्छा कुछ भी नहीं
बस ये ही सबसे अच्छा है
तेरे झूठ की गीली मिटटी से
मेरे सच का बदन साकार हुआ
इश्क़ का कारोबार हुआ
ऐसा इश्क़ का कारोबार हुआ-2

तुम्हारा-अनंत


सोमवार, जून 12, 2017

स्वाहा, आहा और वाह !!

जिस समय हत्याओं की साजिशें
महायज्ञ की तरह की जा रहीं हैं
और सबको स्वाहा में एक आहा खोजने को कहा जा रहा है
तुम उसी समय अपनी कलम में धार करो
इसलिए नहीं क्योंकि इसकी जरूरत है
बल्कि इसलिए क्योंकि ये तुम्हारी मजबूरी है

अगर तुम्हारी कलम में धार
और आवाज़ में आधार नहीं होगा
तो तुम भी गुब्बारे की तरह हवा में उड़ोगे
उसी रास्ते पर बढ़ोगे
जहाँ आखरी में एक खाईं है
और उसकी बाट पर बैठा हुआ एक नाई है
वो पहले उस्तुरे से  तुम्हारी हज़ामत बनाएगा
और फिर उस तरह से तुम्हारी गर्दन उड़ाएगा
कि उसके स्वाहा कहने पर
तुम्हारे मुंह से आहा का स्वर निकलता हुआ सुनाई देगा
ठीक उसी समय तुम्हे हर कोई वाह कहता दिखाई देगा

इसीलिए तुम अपनी कलम की धार तेज करो
और स्वाहा, आहा और वाह के सामने
चीखती हुई आह लिखो
ताकि सनद रहे
कि तुमने स्वाहा, आहा और वाह के समय में भी
आह में आह ही लिखा है !!
आह को आह ही कहा है !!

तुम्हारा-अनंत  
   

सूरत बदली जाती है...!!

सीने की आग, बर्फ सी चुप्पी
धीरे धीरे पिघलाती है
सड़कों पर तनती है मुट्ठी
जगह जगह लहराती है
गाती है, गाती है, जवानी
गीत वही दोहराती है
मेरा रंग दे बसंती चोला वाला
गीत वही दोहराती है
सूरत बदली जाती है
हाँ सूरत बदली जाती है-2

जो तख़्त पे बैठा, बना बादशाह
मूछों पे हाँथ फिराता है
छप्पन इंची वाला सीना
ठोंक ठोंक इतराता है
रोता है, गाता है, देखो
कितने करतब दिखलाता है
बम, गोली, लाठी, डंडे
सब हथकंडे आजमाता है
उस तानशाह के हस्ती
हम मस्तों की मस्ती से थर्राती है
सूरत बदली जाती है
हाँ सूरत बदली जाती है-2

दबी दबी आवाज़ों में भी
कुछ इंक़लाब सा घुलता है
ठन्डे पड़े जिगर में फिर से
लावा कोई उबलता है
जज़्बा सरफ़रोशी का
रह रह कर आज मचलता है
चाहे जितना तेज़ तपे
दमन का सूरज एक दिन ढलता है
जब जब हुई लड़ाई हम ही जीते हैं
दुनिया की तारीख़ यही बताती है
सूरत बदली जाती है
हाँ सूरत बदली जाती है-2

सूखे ख़ून के धब्बे कहते
नहीं सहेंगे जुल्म तेरा
सौ में पूरे नब्बे कहते
नहीं सहेंगे जुल्म तेरा
पॉवों में पड़ी बेड़ियाँ कहती
नहीं सहेंगे जुल्म तेरा
बेटे और बेटियां कहती
नहीं सहेंगे जुल्म तेरा
उठती आवाज़ों के सामने
जुल्मी की गर्दन झुकती जाती है
सूरत बदली जाती है
हाँ सूरत बदली जाती है-2

तुम्हारा-अनंत

रविवार, जून 11, 2017

मोरा पिया नहीं है पास..!!

पतंग याद की
रात की डोरी
उलझन का आकाश
मोरा पिया नहीं है पास-2

आग का दरिया
डूब के जाना
पानी में बहती प्यास
मोरा पिया नहीं है पास-2

शाम सी ढलती
रह रह जलती
जैसे दीपक में जले कपास
मोरा पिया नहीं है पास-2

खारे खारे
लम्हे सारे
मिट गयी सारी मिठास
कि मोरा पिया नहीं है पास-2

दरश जो पाऊं
मैं सुस्ताऊँ
सांस में आये सांस
मोरा पिया नहीं है पास
कि मोरा पिया नहीं है पास-2

तुम्हारा-अनंत

गुरुवार, जून 01, 2017

तल्खियां तेरी आँखों की...!!

तल्खियां तेरी आँखों की बहुत चुभती है
आग ज़िगर में जलती है, आह उठती है

फिर सोचता हूँ, मुझ पर इतना तो करम है
मेरे वास्ते तल्खियां हैं, तो ये भी कहाँ कम हैं

ख़्वाब तेरे सजाए हैं, हमने दिल पत्थर करके
अब टूट भी जाए ये पत्थर तो कहाँ गम है

तेरी आरजू करके काम दिल से ले लिया हमने
अब इस नाकाम दिल का और कोई काम नहीं

तेरी ज़ुस्तज़ू में भटकती धड़कनों को सुकूं है अब
जो दो घडी आराम से बैठ जाएँ तो आराम नहीं

तर्के-ए-मुहब्बत तूने कर लिया पर हमसे न हुआ
हम अब भी तेरे एहसासों के साए में जिया करते हैं

अजब नशा सा है तेरी उल्फत के आंसुओं में सनम
हम मय में घोल के अब खुद के अश्क पिया करते हैं

सब रास्ते जो बंद हो गए हैं तो अब एक ही रास्ता है
कोई नया रास्ता बनाएंगे एक नए रास्ते के लिए

जो सब वास्ते मिट गए तो अब एक ही वास्ता है
कोई नया वास्ता बनाएंगे एक नए वास्ते के लिए

मैं लाख कह दूँ तुझसे पर वो बात कह न पाऊंगा
जो बात मेरी जान में जान की तरह अटकी है

तू वो उलझी हुई गली है जो मंज़िल तक जाती है
तू वही गली है कि जिसमे जिंदगी मेरी भटकी है

मेरी कहानी जो कहानी कहती है तो यही कहती है
कुछ तल्खियां हैं जो मुझमे साँसों की तरह बहती है

तल्खियां तेरी आँखों की बहुत चुभती है
आग ज़िगर में जलती है, आह उठती है

तुम्हारा-अनंत

मंगलवार, मई 30, 2017

ये किसका कुसूर है... !!

मैं जो तुझसे दूर हूँ
तू जो मुझसे दूर है
ये किसका कुसूर है
ये किसका कुसूर है....!!

तू जो मुझसे दूर है
ये किसका कुसूर है... !!

रात ये जो ना ढले
दिल में आग सी जले
चुभ रहा नशा नशा
दम घोटता सुरूर है
तू जो मुझसे दूर है
ये किसका कुसूर है....
ये किसका कुसूर है... !!

ये जो जिस्म की ज़ंज़ीर है
कफ़स कफ़स शरीर है
यूं ख्वाब सारे जल रहे
जैसे जल रहा कपूर है
तू जो मुझसे दूर है
ये किसका कुसूर है....
ये किसका कुसूर है... !!

धड़कनों की ताल पे
यादों की खाल पे
तेरा ख्याल तुपक रहा
जैसे कोई नासूर है
तू जो मुझसे दूर है
ये किसका कुसूर है....
ये किसका कुसूर है... !!

हम दोनों यूं बिछड़ गए
जैसे झोपड़े उजड़ गए
समय की सरकार है
समय साहब है, हुजूर है
तू जो मुझसे दूर है
ये किसका कुसूर है....
ये किसका कुसूर है... !!

तुम्हारा-अनंत

सोमवार, मई 29, 2017

सुलगती हुई लड़की, टूटता हुआ लड़का...!!

काजल आज यूनिवर्सिटी छोड़ रही थी। आज इलाहाबाद में उसका आखरी दिन था। इसलिए वो तेज़ क़दमों ने यूनियन हॉल की तरफ बढ़ रही थी।  उसकी आँखों में एक तलाश थी। जिसका नाम अचल था। अचल पिछले पंद्रह सालों से यूनिवर्सिटी में ही था। पहले BA फिर डबल MA फिर LLB और अब Ph.D चल रही थी। बीच में दो-तीन साल आरती के चक्कर में जेल में भी था।

यूनियन हॉल में अचल सफ़ेद कुर्ता, लाल साफा और नीली जींस पहने हुए मिल गया। काजल ने अचल का हाँथ थामा और उसे यूनियन हॉल के बहार भाभी की चाय की दुकान तक घसीटते हुए ले आयी। अचल ने आश्चर्य से पूछा, क्या हुआ काजल ? कोई बात है क्या ? काजल ने कहा, "हाँ है, और जो आज तुमसे नहीं कह पायी तो ज़िन्दगी भर खुद को माफ़ नहीं कर पाउंगीं। कल मैं इलाहाबाद छोड़ कर जा रही हूँ अचल !!" अचल कुछ बोलता इससे पहले एक गुजरते हुए साथी ने "कॉमरेड लाल सलाम" कर दिया। अचल, काजल को "थोड़ा रुको, मैं आता हूँ" कहते हुए आगे बढ़ गया। काजल कुछ देर खड़ी रही और फिर अचल के पास जा कर कहा, "शाम पांच बजे सरस्वती घाट पर मिलो, नहीं मिले तो फिर कभी नहीं मिल सकोगे"। अचल, ''अरे रुको बात करते हैं......" काजल मुड़ी और तेज़ क़दमों से हॉस्टल की ओर चल पड़ी। प्रॉक्टर ऑफिस पर छात्र प्रदर्शन कर रहे थे, और वहां बाइक से पहुंचा अचल, एक साधारण लड़के से “कॉमरेड अचल” में बदल गया। काजल ने अचल को “कॉमरेड अचल” बनते देखा और गर्ल्स हॉस्टल चली गयी।

पांच बजने से आधे घंटे पहले ही काजल सरस्वती घाट पहुँच गयी।  सूरज अभी तप रहा था। अभी ठीक से शाम नहीं हुई थी। इसलिए काजल पेड़ के नीचे बैठ गयी। एक घंटे काजल ने इंतज़ार किया और साढ़े पांच बजे जब गंगा आरती की तैयारी होने लगी तो काजल चलने का मन बनाने लगी। तभी उसने देखा अचल चला रहा है। उसकी चाल ऐसी थी कि कोई जी भर देख ले तो प्यार कर बैठे। काजल सीढ़ियों से उतर कर आखरी सीढ़ी पर गंगा में पैर डाल कर बैठ गयी। अचल भी काजल के बगल में जा कर बैठ गया। काजल और अचल के बीच फैले सन्नाटे को तोड़ते हुए अचल ने कहा, "काजल, वो पुल देख रही हो। लोहे का, नट-बोल्ट से कसा हुआ"
काजल- हाँ देख रही हूँ। 
अचल- उसे देख कर क्या ख्याल आता है?
काजल- कोई ख्याल नहीं आताअसल में, कभी ऐसे सोचा नहीं।
अचल- आज के बाद जब तुम पुल देखोगी तो तुम्हे मेरा ख्याल आएगा।

काजल को जाने क्या हुआ कि उसकी आँखों में आसूं गए। उसने अचल का हाँथ, हांथों में थाम लिया। ''  अचल मैं तुमसे प्यार करती हूँ अचल, मैं  तुम्हें ये बताना चाहती थी" काजल ने भरी-भरी आवाज़ में कहा।

अचल- मैं जानता हूँ काजल !
काजल- तुमसे मिलने के बाद मुझे पहली बार लगा कि मैं सिर्फ एक लड़की नहीं हूँ। एक इंसान भी हूँ। नहीं तो जब से दुपट्टा लेने लगी, मुझे एहसास कराया गया कि लड़की होना एक चौकीदार होना है। जिसे अपने जिस्म में छुपी हुई एक अदृश्य तिजोरी की रखवाली करनी है।

अचल को काजल की बात पर हंसी गयी और काजल शरमा गयी।

अचल ने कहा, " दुष्यंत कुमार को जानती हो? लाजवाब शायर था। इंक़लाब लिखता था। इश्क़ से उपजा इंक़लाब। वो यहां कीडगंज में किराए का कमरा ले कर रहता था। वहीँ किसी लड़की से इश्क़ कर बैठा। फिर लड़की की शादी हो गयी। दुष्यंत से नहीं। बनारस के किसी अमीर आदमी से। वो रेल में बैठ कर बनारस चली गयी और दुष्यंत पुल की तरह थरथराते खड़े रहे" कुछ देर खामोश रहने के बाद अचल ने कहा, "ये पूल टूटे हुए आशिकों का थरथराता हुआ देह है, दुष्यंत, उस दिन के बाद अक्सर शाम को इसी पुल के नीचे जाते थे और भरे हुए गले से गया करते थे।

"तू किसी रेल सी गुजरती है / मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ"

काजल ने अचल की बात काटते हुए कहा, "पर तुमने तो कहा था कि मैं पुल देखूंगी तो तुम्हारी याद आएगी।  तुम दुष्यंत कुमार की कहानी सुना रहे हो"

अचल ने हँसते हुए कहा, "इस दुनिया में हर टूटे हुए आशिक की कहानी एक जैसी ही तो है। दुष्यंत को याद करना, मुझे याद करना है और मुझे याद करना इस थरथराते हुए पुल को याद करना है"

काजल कुछ देर चुप रही फिर उसने धीरे से कहा, "अचल तुम मुझसे प्यार करते हो कि नहीं" ?
अचल ने हल्की मायूस आवाज़ में कहा, "काजल मैं थरथराता हुआ नहीं, टूटा हुआ पुल हूँ। तुम्हे उस पार नहीं पहुंचा सकूंगा"

काजल ने हल्की खीज के साथ कहा, "क्या हुआ अचल, मुझे साफ़ साफ़ बताओ !!"

अचल ने एक गहरी सांस बाहर फेंकते हुए कहा, "पुल के उस पार दूर जो सबसे बड़ा मकान देख रही हो, वो घर आरती का था" अचल ने जैसे ही आरती का नाम लिया। गंगा जी की आरती शुरू हो गयी, पर काजल को अचल की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। ये कहानी अगर फिल्म होती तो गंगा-आरती की आवाज़ गज़ब का साउंड इफेक्ट पैदा करती, और आपकी आँखों में आंसू भी सकते थे।

अचल:-आरती को मैंने विद्रोह करना सिखाया, किसी को विद्रोही बनाना उसके भीतर प्रेम के बीज को रोपना है। आरती विद्रोही हो रही थी इसलिए उसने प्रेम करना भी शुरू कर दिया। उसने एक दिन यहीं, इन्हीं सीढ़ियों पर बैठे हुए मुझसे कहा, “अचल मैं तुमसे प्रेम करती हूँ " जब उसके मुंह से प्रेम शब्द निकला तो मुझे उसका वो बड़ा घर दिखा, फिर उसके पिता और भाइयों का रसूख फिर अपना फूस का छप्पर, अपने विक्षिप्त पिता और बूढी माँ चेहरा मेरी आँखों के सामने नाचने लगा। मेरे कानों में उनके सपने गूंजने लगे। मैंने कहा, आरती मैं तुम्हारे काबिल नहीं हूँ, आरती ने झुंझलाहट में पूछा, क्यों ? क्योंकि तुम गरीब हो? मैं चुप था, और आरती ये बताती हुई चली गयी कि उसके घरवाले उसकी शादी करना चाहते हैं, पर वो ये नहीं होने देगी। आरती के जाने के बाद मैं अपने भीतर के कायर से रात भर लड़ता रहा। रात में करीब ढाई बजे आरती का फोन आया। आरती रो रही थी। उसने रोते हुए कहा, "अचल चलो भाग चलते हैं" मैंने तुरंत जवाब दिया, "आरती मुझे भागना नहीं आता" आरती ने फोन रख दिया। फोन रखते हुए वो ऐसे रोई जैसे कोई बड़ी इमारत गिरी हो। मुझे लगा उसका बड़ा घर उसके ऊपर गिर पड़ा हो।

अचल अब खामोश हो गया था, काजल ने अचल के कंधे पर हाँथ रख कर पूछा, "फिर क्या हुआ, अचल ?

अचल:अगली सुबह जब यूनिवर्सिटी पहुंचा तो पता चला आरती ने आत्महत्या कर ली है। वो भागना चाहती थी। मैंने मना किया तो अकेले ही भाग गयी। दोस्तों ने बताया उसने मेरे लिए एक खत लिख छोड़ा है। दोस्तों ने सलाह दी मुझे भाग जाना चाहिए। मैंने तुरंत कहा, "मुझे भागना नहीं आता" अगले एक घंटे मैं यहाँ-वहाँ पागलों की तरह टहलने के बाद इसी पुल के नीचे शमशान में खड़ा था। आरती धुएं में बदल रही थी। उसी समय एक रेलगाड़ी पुल से गुजरी और आरती की चिता से उठता हुआ धुआँ पुल से टकराया और मुझे महसूस हुआ कि पुल टूट गया है। रेल गंगा में गिर गयी है और अब कोई रेल इस पुल से फिर कभी नहीं गुजरेगी। मैं ये सब महसूस कर रहा था कि एक हाँथ पीछे से मेरे गिरेबान पर पड़ा और आवाज़ हुई, "यही है वो लौंडा...यही है वो लौंडा..." मुझे लोग पीट रहे थे और मुझे दर्द नहीं हो रहा था। पुलिस ने मुझे गिरफ्तार किया और तीन साल तक मैं जेल में रहा। इस बीच माँ मर गयी और पिता कहीं खो गए। मुझे अब भी भागना नहीं आया था। मैं यूनिवर्सिटी आया और जो विद्रोह मैं तब नहीं जी सका था। उसे जीने लगा। प्रेम को जीना विद्रोह को जीना है। इसलिए मैं सारा जीवन विद्रोह करता रहूँगा। सारा जीवन प्रेम करता रहूँगा।

रात के आठ बज रहे थे। अचल ने काजल को बाइक पर बिठाया और मनकामेश्वर, बैहराना, बालसन, आनंद भवन होते हुए गर्ल हॉस्टल पर छोड़ दिया। रास्ते भर दो पक्तिं गुनगुनाता रहा......."तुम अज़ब धुएँ सा सुलगती हो/ मैं किसी पुल सा टूट जाता हूँ" काजल, अचल का टूटना महसूस करती रही और अचल, काजल का सुलगना। अचल ने काजल को गर्ल्स हॉस्टल छोड़ा और आनंद भवन के सामने ज़र्ज़र ईमारत में बने पार्टी दफ्तर में चला गया। उस रात वो ऐसे रोया जैसे पहले कभी नहीं रोया था। अचल विद्रोह के हर मोर्चे पर लड़ा और छत्तीसगढ़ के किसी मोर्चे पर अनुशासन की किसी गोली का शिकार हो गया।

ये बात काजल को कभी नहीं पता चली जैसे अचल को कभी नहीं पता चला कि काजल ने अपने बेटे का नाम अचल रखा है और बेटी का नाम आँचल। काजल के बेटे अचल को दुष्यत कुमार की ग़ज़लें बहुत पसंद है और वो "तू किसी रेल सी गुजरती है/ मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ" कि जगह काजल के मुंह से सुनी हुई लाइनें  "तुम अज़ब धुएँ सा सुलगती हो/ मैं किसी पुल सा टूट जाता हूँ" गाता है। 

तुम्हारा-अनंत